Janmashtmi Kyo Aur Kaise Manate Hai [Shree Krishnashtmi]

जन्माष्टमी क्यों और कैसे मनाते है

भगवान श्री विष्णु ने पृथ्वी पर पापमुक्त  करने के लिये भाद्रपद माह के दिन कृष्णा पक्ष के अष्टमी के मध्यरात्री के रोहिणी नक्षत्र में कृष्ण रूप में जन्म लिया 

जन्माष्टमी का अथाॅत् कृष्ण जन्मोत्सव इस बरस जन्माष्टमी का त्यौहार सप्तम्बर सोमवार को मनाया जाता हैं जन्माष्टमी के आगमन से पहले ही इसकी तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो जाती हैं। पूरे भारत बरस में इस त्यौहार का उत्सव देखने लायक होता हैं चारो और का वातावरण भगवान श्रीकृष्ण के रंग में रंगा हुआ रहता है। जन्माष्टमी पूणॅ आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पौराणिक धमॅ ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर पापमुक्त करने के हेतु कृष्ण रूप में जन्म लिया भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के मध्यरात्री के रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी को स्मातॅ और वैष्णव के समुदाय के लोग अपने अनुसार अलग अलग ढंग से करते हैं।

श्रीमतभागवत को प्रमाण मान कर स्मातॅ समुदाय के लोग चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अथाॅत् रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी  मनाते है तथा वैष्णव संप्रदाय मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते है।

जन्माष्टमी क्यों और कैसे मनाते है

जन्माष्टमी के विभिन्न रंगरूप :

यह त्योहार विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। कही रंगों की होली होती है तो कही फूलों और इत्र के सुगंध का उत्सव होता है और कही दहीं हांडी फोडने का जोश और कही तो इस मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की मोहक छविया देखने को मिल जाती है। मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। भक्त इस अवसर पर व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं। इस दिन मंदिरो में झाकिया सजाई होती है। भगवान श्रीकृष्ण के झुला झुलाने का और कृष्णा रामलीलाओं का आयोजन होता है।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के दशॅनों के लिये दूर-दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुचते हैं। मंदिरों को खास तौर पर सजाया है। मथुरा के सभी मंदिरों को रंगबेरंगी लाइटों एवं फुलों से सजाया जाता है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव देखने के लिये देश नहीं परंतु विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पहुंचते हैं। भगवान के विग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर इत्यादि चढाकर इसका एक दूसरे के ऊपर छिडकाव करते हैं। इस दिन पर मंदिरों में झाकियां सजाई होती है तथा भगवान श्रीकृष्ण को झुला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी व्रत एवं विधिओं :

शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करके भक्त को मौक्ष की प्राप्ति होती हैं। यह व्रत कामनाओं को पूणॅ करना वाला होता हैं। श्रीकृष्ण की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण  की भक्ति से परिपूर्ण करना होता हैं। यह व्रत सनातन धर्मवबंलियां के लिये अनिवार्य माना जाता है। इस दिन उपवास रखे जाते हैं तथा श्रीकृष्ण की भक्ति के गीतों का श्रवण किया जाता है। घर के पूजागृह और मंदिरों में श्रीकृष्ण की रासलीला की झाकिया सजाई होती है।

जन्माष्टमी के दिन प्रात:काल उठकर नित्य कमाँ से निवृक्त होकर पवित्र नदियों में, पोखरों में या घर पर ही स्नान आदि करके जन्माष्टमी व्रत का संकल्प किया जाता है। पंचामृत एवं गंगा के जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पितण, मिट्टी की मूर्ति या चित्र को पालने में स्थापित किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को नये वस्त्र से सजाया जाता है। बालगोपाल की प्रतिमा को पालने में बैठाया जाता है तथा सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते हैं। पूजन में माता देवकी, वासुदेव, कृष्ण, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इत्यादि के नामों का उच्चारण करते हैं तथा उनकी मूर्तियां भी स्थापित करके पूजन करते हैं।

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